Thursday, May 19, 2011

Wednesday, July 25, 2007

implosive rage

Like the kiss of bloodied lips,
Like a violation that caresses me
With the sick sweetness of familiarity

I walk the thin edge
Scared and tempted
To jump in

And join the sweet, mad voices
Crooning to me from deepest Hell
Hellfire: so warm in a cold, cold world

O Shiva, I know how you feel
How you have felt
Since before Time began

Rage
Grief
Frustration
Shame
A heady cocktail
Too heady to drink

So you trapped it
The only way you could.
I am trapped too
Let me out, won’t you?

Friday, June 15, 2007

मेरी शर्म लाज रख ले

चुनरी उड़ई रे सैयाँ
उसको संभाल रे
तेरी अमानत हूँ मैं तो
मेरी शर्म लाज रख ले


मुझे पिघला दिया , बहते हुए इस मोम का क्या करूं
मुझे संवार दे - इस बार परवाना कर दे
शमा तो बस जलाती है, मुझे आज जलने दे
मुझे संवार दे - आज अपना परवाना कर दे

चुनरी उड़ई रे सैयाँ
उसको संभाल रे
तेरी अमानत हूँ मैं तो
मेरी शर्म लाज रख ले

तेरी साँसों के ताने से बुनी यह चादर मेरी
मेरी साँसों का बाना इसमे से तू उधेड़ दे
इन चीथ्रों को तू यूं समेट ले
नयी चादर नया रंग दे
मेरी शर्म -लाज रख ले

चुनरी उड़ई रे सैयाँ
उसको संभाल रे
तेरी अमानत हूँ मैं तो
मेरी शर्म लाज रख ले

इस जहाँ में सब कहतें हैं की तू ही उनका है
इक मुझे ठुकरा के क्या तू पायेगा बता
अपनी महफिल की देहलीज़ पे ही सही
मुझ को जगह दे दे

तेरी अमानत हूँ मैं तो
मेरी शर्म लाज रख ले

'ग़र महफिल की देहलीज़ पे ठुक्रायेगा मुझे
बाहर तो चला जाऊंगा पर पाऊंगा तुझे
'ग़र शर्म -लाज छोड़ के नाचूँगा मैं आज
मुझे समेट लेगा अपनी बाहों में ही तू
मैनें तोड़ दी हुड -ए -हया की आज दीवारें
जब पार की हयात की हद, तो ए साँवरे
तुझसे ही रूबरू होकर मैनें यह पूछा
क्यों ना रक्खी मेरी शर्म -ओ -लाज तूनें

तूनें कहा की प्यार ही में बस्ता है तू यार
और यार के बीच शर्म - लाज है इक दीवार
जो ज़ाहिर है वोह शर्म नहीं
जो बातिन है वोह प्यार

फिर तू ने मुझ से कह दिया
की हम तो एक हैं
तेरी अमानत हूँ मैं तो
मेरी शर्म लाज रख ले

Sunday, May 06, 2007

आंखें नम हुईं और बातें कम हुईं

Courtesy Max Babi in Pune:

कुछ सपने और कुछ आंखों में नमी है
एक छोटा सा आस्मान और उम्मीदों की ज़मीं है
यूं तो बहुत कुछ है, जिन्दगी में सीर्फ जीसे चाहते हैं...
उसी की कमी है

Ishqa was obviously in a more cynical mood...


जेठ की गरमी में
नमी सूख जाती है
वक़्त की मार से
कमी भूल जाती है

Wednesday, December 20, 2006

warm winter haiku

Like potatoes roasted in glowing embers and had with dollops of home-made butter, there are some things that are only savoured in the winter - like the warmth and the cold.

Yea, to the season of cosiness and hot cocoa

:D
R



I turn lazily
in the post-coital warmth of
the winter sun's arms


cold fingered Mist turns
away from my bright window
leaves me warm inside

Thursday, November 02, 2006

shawl of wax

Last year, in the month of Paush
I had wrapped myself
in a shawl of wax

In the bitter cold
it froze me with my songs
And would not melt in the heat of Jeth

This year again, I heard
the footsteps of winter.
Sighed and stiffened

But it was the approach of autumn I heard
That first dew fresh kiss of a warm sun,
And I melted without fire

In the unheard sound, I heard music again
Unseasonably, I hummed the chaiti* again

Today I died again
Today, "Ishqa" lived again


*Typical East UP folk tune sung in the Spring, around Holi, which takes it's name from the month of Chait when it is performed. It carried wrapped in it the fragrance of the new year and joy.


पर साल मैनें
मोम की दोशाला
ओढी थी पौष में

शीत में जम गए
मैं, और मेरे तराने
जेठ में भी पीघल ना सकेय

इस साल जो आहट सुनी
शीत के फीर आने की
फीर आह भरी , अकड़ चली ...

पर वो आहट थी बहार की
पहली ओस की , नर्म धुप की
बीन आग के ही पीघल चली

अनहद में सुनें तराने मैनें
बीन मौसम गायी चैती मैनें

आज मैं फीर मर चली
"इश्का " अब फीर जीं चली

Wednesday, September 13, 2006

क्या देखा ...

आज यह आंखें
आप की आंखों से
भर चलीं

सपने बुने
अपने चुने

इन ख्यालों से
नम हो चलीं

यह शुब ^ जब ढल चली
कोख से अंधेरे में
मैं सीमटी और पली ...

अब रोशन एक चीराग ने
दीखायी सेह्र की गली

उस दीये में क्या कुव्वत * है ?
जो झेल सके सेह्र # का नूर ?
या राह दीखा कर बुझ जाएगा
हो कर "इश्का" से मजबूर ?

^ evening
* power
# dawn

***

these eyes were filled
with yours today

weaving dreams
choosing dear ones

and weeping just a little

when my night fell
I curled up, foetus-like

now a lamp lights my way
to the break of a new day

will that lamp last through dawn
live on in the brilliant morn?
or will it show the way to "Ishqa"
and then be gone?